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| غزل شمارهٔ ۲۶۷ گلعذاری ز گلستان جهان ما را بس | زین چمن سایه آن سرو روان ما را بس | |
| من و همصحبتی اهل ریا دورم باد | از گرانان جهان رطل گران ما را بس | |
| قصر فردوس به پاداش عمل میبخشند | ما که رندیم و گدا دیر مغان ما را بس | |
| بنشین بر لب جوی و گذر عمر ببین | کاین اشارت ز جهان گذران ما را بس | |
| نقد بازار جهان بنگر و آزار جهان | گر شما را نه بس این سود و زیان ما را بس | |
| یار با ماست چه حاجت که زیادت طلبیم | دولت صحبت آن مونس جان ما را بس | |
| از در خویش خدا را به بهشتم مفرست | که سر کوی تو از کون و مکان ما را بس | |
| حافظ از مشرب قسمت گله ناانصافیست | طبع چون آب و غزلهای روان ما را بس |